बेटियों की पीड़ा को दर्शाता, मुख्यमंत्री को एक माँ का दर्द भरा ख़त

महोदय मैं एक माँ हूँ और शायद इसीलिए इस पीड़ा को मैं आपसे कही ज़्यादा अच्छे ढंग से समझ सकती हूँ. एक माँ होने के साथ साथ में एक बेटी, बहन, बहु भी हूँ. और एक महिला होने के नाते ये दुःख की पीड़ा आपके साथ बाँट रहीं हूँ ताकी आप इसका कुछ निवारण निकाल सकें. महोदय जैसा की आप जानते हैं की हमारा समाज शुरू से ही पुरूष प्रधान रहा हैं और बहु बेटियों को शुरू से ही परदे में रखा गया या फिर जन्म लेने का अधिकार भी नहीं मिला. मैं आए दिन टी वी, अखबारो में ख़बर पढ़ कर सुन कर बेचैन सी हो रहीं हूँ. मैं समझ नहीं पा रहीं हूँ की किस तरह से मैं उन बेटियों को बचाऊँ जो जन्म लेने से पहले ही कोख में मारी जा रहीं हैं या जो पैदा होते ही बीच सड़क या कूड़े के ढेर में पड़ीं मिल रही हैं. कहते है ना शुरुआत पहले अपने घर से की जानी चाहिए. मैं यह पत्र मोदी जी को भी लिख सकती थी लेकिन पहले अपने घर अपने उत्तराखंड से शुरुआत हो तभी बाक़ी राज्य या देशभर में बोला जाए. मैंने अभी कुछ दिन पहले एक विडीओ के ज़रिए भी अपनी बात रखने की कोशिश की थी लेकिन जैसा की देखा गया हैं की ये समाज इन चीज़ों को नज़र अन्दाज़ ही करता हैं वही हुआ उस विडीओ के साथ भी.
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महोदय मैं ये चाहती हूँ की जैसे की सरकार हर तरह की मुहिम चला रहीं हैं बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ लेकिन इन मुहिम को चलने के बावजूद कोई असर नहीं दिख रहा हैं आज भी बेटियाँ जन्म लेने से पहले कोख में ही मार दी जाती हैं या फिर रेल्वे स्टेशन, कूड़े के ढेर आदि जगह पर मिलती हैं. इसकी रोक थाम कैसे हो इसके लिए कुछ कीजिए. मुहिम चलाने से कुछ नहीं होगा ये सारी मुहिम बस अख़बारों में रह जायेंगी. क्या आपको लगता हैं आप लोगों का ये संदेश उन तक पहुँच रहा होगा कहा तक पहुँचना चाहिए?? नहीं सर सब कुछ इन काग़ज़ों में ही रह जाएगा.
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आज उत्तराखंड का नाम उत्तराखंड की जन्मी बेटियाँ ही कर रहीं हैं. आज विश्व में उत्तराखंड की बेटियों का पंचम लहरा रहा हैं ऐसे में हम आज उन्ही बेटियों को जन्म लेने से रोक रहें हैं. एन॰जी॰ओ॰ खुले हैं बहुत लेकिन वहाँ भी सेवा के नाम पर शोषण होता हैं. ये बात किसी से नहीं छिपीं हैं की महिला आश्रम या बाल आश्रम में क्या क्या कुकरम हुए हैं. महोदय मैं कुछ करना चाहती हूँ उन बिटियो के लिए. लेकिन इस सिस्टम से हटकर क्यूँकि सिर्फ़ काग़ज़ी चीज़ें मुझे नहीं करनी. मैं जब भी अपनी साल भर की बेटी को खाना खिलातीं हूँ तो मन में सवाल उठता हैं की ना जाने कितनी बेटियाँ आज रोड पर फेंक आया होगा कोई? भूख से बिलक रहीं होंगी वे. उनको ममता का आँचल ओढ़ाने कोई आया होगा भी या नहीं ?? कहीं आज फिर किसी कुत्ते के रात के खाने का शिकार ना बन गयीं हो ?

महोदय पत्र लिखते लिखते मेरे हाथ काँप रहे है और आँखो से आँसू निकल रहें हैं शायद आप वो भाव ना समझ पाए लेकिन एक माँ के स्थान पर आकर देखिए सब समझ पाएँगे. कितनी बेबस और लाचार होती होगी वो माँ जो ये करने के लिए मजबूर होती होगी. महोदय मैं जानती हूँ आप बहुत व्यस्त हैं, अगर आप ज़रा सा टाइम निकाल कर एक भेंट कर ले तो मैं आपसे इस सन्दर्भ में विस्तार से बात करना चाहूँगी. और कुछ सुझाव देना चाहूँगी. बाक़ी जैसा आप ठीक समझें.

-शिल्पा भट्ट बहुगुणा (89796-08283)

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