प्राचीन कथा: कैसे एक गधा धेनुकासुर बना

आज हम आपको धेनुकासुर को कृष्ण के द्वारा मारे जाने की कथा बताने जा रहे है. यह बात उस समय की है जब राजा बलि का पुत्र साहसिक देवताओं को युद्ध में परास्त कर गन्धमादन की ओर प्रस्थित हुआ था. साहसिक के साथ उसकी विशाल सेना चल रही थी. जब वह गंधमादन की ओर प्रस्थान कर रहा था तो मार्ग में उस समय स्वर्ग की अप्सरा तिलोत्तमा उधर से गुजर रही थी. अप्सरा और साहसिक ने एक-दुसरे को देखा. और दोनों ही एक-दुसरे के प्रति आकर्षित हो गये.
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स्वर्ग की अप्सरा तिलोत्तमा ने अपने रूप सौन्दर्य से साहसिक को मोहित कर दिया था. और वे दोनों एकांत में यथेच्छ ही विहार करने लगे थे. उसी समय उसी स्थान पर ऋषि दुर्वासा भगवान श्री कृष्ण के चरणों का चिंतन कर रहे थे. तिलोत्तमा और साहसिक दोनों ही उस समय कामवश होने के कारण चेतनाशून्य थे. और इसी कारण वे अत्यंत निकट बैठे मुनि को नहीं देख पाए थे. जब उन दोनों का शोर सुना तो सहसा ही मुनि का ध्यान भंग हो गया. और ऋषि दुर्वासा ने उन दोनों की कुत्सित चेष्टाएँ देखकर क्रोधित हो गये और ऋषि ने कहा.

ऋषि दुर्वासा बोले— हे गदहे के समान निर्लज नराधम. उठ ! तू भक्त बलि का पुत्र होकर पशु की भांति आचरण कर रहा है. पशुओं के अलावा सभी जीव मैथुन कर्म करते समय लज्जा करते हैं. विशेष रुप से गधे लज्जा से विहीन होते हैं; अतः अब तू गधे की योनि में जा. हे तिलोत्तमे ! तू भी उठ. एक अप्सरा होने के बाद भी दैत्य के प्रति ऐसी आसक्ति रखती हो; तो अब तू भी दानव योनि में जन्म ग्रहण कर. इतना वचन कहकर ऋषि दुर्वासा चुप हो गये. तत्पश्चात वे दोनों ही मुनि से लज्जित और भयभीत होकर मुनि की स्तुति करने लगे. और मुनि के चरण पकड़ने लग गये.

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