प्राचीन कथा: कैसे एक गधा धेनुकासुर बना

साहसिक ने कहा – हे मुने श्रेष्ठ ! आप ही ब्रह्मा, विष्णु और साक्षात् महेश्वर हैं. हे भगवन् ! मेरे द्वारा किए गये अपराध को क्षमा करें. मुझ पर कृपा करें. यह कहकर साहसिक उनके चरण पकड़ कर फूट-फूट कर रोने लगा.

तिलोत्तमा ने कहा — हे ऋषि ! हे द्विज श्रेष्ठ ! मुझ पर कृपा करे. किसी कामुक प्राणी में चेतना और लज्जा नहीं रहती है. हे मुनि ऐसा कर्म कामवश होकर हुआ है. यह कहकर तिलोत्तमा भी रोने लगी.
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साहसिक और तिलोत्तमा दोनों की व्याकुलता और उनके आंसू देखकर दुर्वासा मुनि को दया आ गयी.
मुनि दुर्वासा बोले — हे दैत्य ! तू भगवान विष्णु के भक्त बलि का पुत्र है. और अपने पिता का स्वभाव पुत्र में अवश्य रहता है. जिस प्रकार कालिया के सिर पर अंकित भगवान श्री कृष्ण के चरण का चिन्ह अन्य सभी सांपो के मस्तक पर रहता है. हे वत्स ! तू एक बार गधे की योनि में जन्म लेकर मोक्ष को प्राप्त होगा. तू वृन्दावन के तालवन में जा. और वहाँ भगवान श्री कृष्ण के चक्र से तेरे प्राणों का परित्याग करके तूझे शीघ्र ही मोक्ष की प्राप्त होगी. हे तिलोत्तमे ! तू दैत्य वाणासुर की पुत्री होगी; और फिर भगवान श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का आलिंगन पाकर पवित्र हो जायगी.

इतना कहकर ऋषि दुर्वासा चुप हो गये. तत्पश्चात् साहसिक और तिलोत्तमा भी दुर्वासा मुनि को प्रणाम करके अपने अपने स्थान पर चले गये. और इस प्रकार साहसिक ने गर्दभ अर्थात गधे योनि में जन्म लिया और भगवान श्री कृष्ण के हाथो मृत्यु पाकर मोक्ष को प्राप्त हुआ और अगले जन्म में धेनुकासुर हुआ और तिलोत्तमा बाणासुर की पुत्री उषा होकर अनिरुद्ध की पत्नी बनी.

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