पद्मपुराण – सफल व्यक्ति को भी पूरी तरह बर्बाद कर सकती हैं ये बातें, इनसे दूर रहें

हिन्दू धर्म में 18 पुराण का उल्लेख मिलता है. पद्मपुराण भी हिंदू धर्म के अठारह महापुराणों में से एक है. हमारे धर्म पुराणों में जीवन में उपयोगी सभी बनतो के बारे में बताया गया है. पुराणों में विदित है कि एक साधारण से जीवन को उच्च विचारो के साथ कैसे जिया जा सकता है. पुराणों का कार्य व्यक्तियों का मार्ग प्रशस्त करना है. पद्मपुराण में ऐसी चार आदतों के बारे में उल्लेख किया गया है, जो किसी भी मनुष्य के जीवन विष के समान कार्य कर सकती है. अर्थात मनुष्य के जीवन को बर्बाद कर सकती है. जीवन में हमेशा सफलता के शिखर तक जाने के लिए मनुष्य को इन 4 आदतों से बिल्कुल दूर ही रहना चाहिए.
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आइये जानते है कौन सी है ये चार आदत—
पद्मपुराण में एक श्लोक दिया गया है जिसमे उन आदतों का उल्लेख है वह श्लोक इस प्रकार है कि–
श्लोक–

न चात्मानं प्रशंसेद्वा परनिन्दां च वर्जयेत्।
वेदनिन्दां देवनिन्दां प्रयत्नेन विवर्जयेत्।।

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श्लोक के अनुसार-

1. खुद की तारीफ़ करना

व्यक्ति को कभी भी खुद की तारीफ नही करना चाहिए क्योकि खुद की तारीफ़ करने की आदत मनुष्य को घमंडी और स्वार्थी बना देती है. ऐसे लोग खुद की तारीफ करते नही थकते है वो हमेशा स्वयं को दूसरों से ऊपर दिखाने की कोशिश करते रहते हैं. इस प्रकार खुद को ही श्रेष्ठ मानने या दिखने की आदत किसी भी मनुष्य के जीवन को बर्बाद कर सकती है, अतः खुद की तारीफ करने से बचना चाहिए.

2. भगवान की निंदा करना

ऐसे लोगो की कमी नही है जो धर्म और भगवान में आस्था और विश्वास नही रखते है. ऐसे व्यक्ति को ना तो धर्म-ज्ञान से कोई मतलब होता है, न ही देव भक्ति से. वे व्यक्ति इश्वर प्रेम से कोषों दूर होते है उन्हें भगवान की भक्ति से परहेज होता है. हम उन्हें नास्तिक भी कह सकते है. ऐसे व्यक्ति जो धर्म और शास्त्रों में विश्वास नही रखते है, इसके कारण वे अधर्मी और पापी होते है और अपनी बर्बादी का कारण खुद बनते है. ऐसे लोग किसी की भावनाओ की कदर भी नही कर सकते है.

3. वेदों का अपमान करना

हिन्दू धर्म में वेदों और धर्मग्रंथों-पुराणों को पूजनीय और सर्वश्श्रेष्ठ माना जाता हैं. आज लोगो के मनो में इनके प्रति रूचि कम होने लगी है. हमारे वेद और ग्रंथ के लिए लोगो के अंदर महत्व और सम्मान खत्म होने लगा है. और ऐसे लोगो भी कमी नही है जो इनका अपमान करने में भी संकोच नही करते है. इस प्रकार वेदों और पुआरानो का अपमान करके वे लोग अपनी बर्बादी का कारण स्वयं बनते है.

4. दूसरों की निंदा करना

हमे किसी की निंदा नही करना चाहिए. हमारे धर्मग्रंथो और वेदों में इस बात का उल्लेख किया गया है की किसी की निंदा या अपमान करना दोष होता है. किसी की निंदा करने वाला व्यक्ति अक्सर अपने मूल कार्य को भूल जाता है और निंदा करने के कारण दुसरे लोगों से पीछे रह जाता है. यदि तुम वास्तव में सफल होना चाहते हो तो अपने कार्य को पूरी लगन से करे और किसी की निंदा न करे.

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