राष्ट्रभाषा और राजभाषा की लड़ाई में कहीं राष्ट्र का वर्चस्व तो दांव पर नहीं लग रहा!

राजभाषा और राष्‍ट्रभाषा में क्‍या अंतर है | Difference Between Rajbhasha and Rashtrabhasha in hindi

कुछ समय पूर्व ही मेरे एक मित्र ने मुझसे प्रश्न किया कि क्या तुम हाईकोर्ट में पैरवी हिंदी में कर सकते हो या नहीं? और क्या हिंदी का उपयोग इतने बड़े संस्थान में करना उचित है? मुझे सवाल कुछ अजीब लगकर मेरे मन को टीस दे गया क्योंकि मै भी उन चुनिन्दा लोगों में से हूँ जो ये चाहता है की एक राष्ट्र और एक राष्ट्रभाषा हो, चाहे देश के विभिन्न राज्यों में अलग या स्थानीय या राज्य में प्रचलित भाषा बोली जाए किन्तु एक राष्ट्र की पहचान या उसकी राष्ट्रभाषा का दर्जा किसी एक भाषा को दिया जाना चाहिए.

बहरहाल आप में से कई लोग ऐसा सोच रहे होंगे कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है तो फिर ये बहस क्यों? तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हिंदी हमारी राजभाषा है राष्ट्रभाषा नहीं अर्थात हमारे किसी कानून या संविधान के किसी अनुच्छेद में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया है अपितु राजभाषा कहा गया है, भारत के संविधान के अनुच्छेद 346 से 347 में हिंदी को प्राथमिक तौर पर उल्लेखित ज़रूर किया है किन्तु दर्जा नहीं दिया गया. मेरे मित्र के प्रश्न का उत्तर भी इन्ही एक अनुच्छेद में है जिसमे कहा गया है कि संविधान के अधीन अथवा संसद या किसी राज्य के विधान मंडल द्वारा बनाई गयी किसी विधि के अधीन निकले गए या बनाये गए सभी आदेशों, नियमों, विनियमों और उपविधियों के प्राधिकृत पाठ अंग्रेजी भाषा में ही होंगे.

भारत की पहचान विश्व पटल पर अनेक भाषा, त्यौहार, परम्पराओं की धरती के रूप में है, फिर भी विदेशी धरती पर जब हम हिंदी या किसी अन्य भाषा में बोलते है तो जवाब यही होता है “Sorry i don’t know Hindi” तात्पर्य हिंदी भाषा ही विश्व में हम हिन्दुस्तानियों का प्रतिनिधित्व कर रही है. विश्व में 5% के साथ हिंदी तीसरी सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा है. जनसंख्या के हिसाब से, विश्व में अन्य देशों में पलायन कर रहे व कर चुके भारतीयों के हिसाब से हिंदी को प्रथम या द्वितीय स्थान प्राप्त होना था किन्तु अब वह अपने तीसरे पायदान से भी नीचे खिसक रही है. इसका कारण एक नहीं है अपितु राज्यों व लोगों की सोच के हिसाब से कई कारण है उसमे प्रमुख है अपने राज्य, अपनी जाती व समाज की भाषा को प्राथमिक दर्जा देना जैसे हाल ही में कर्नाटक में हिंदी का विरोध, महाराष्ट्र में मराठी को वरीयता. 21वीं सदी में युवाओं व लोगों का अंग्रेजी के प्रति झुकाव, रुझान व बड़े-बड़े संस्थानों में हिंदी बोलने पर किसी व्यक्ति को हीन भावना से देखना तक इस देश में हो रहा हैं.

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जिस देश में किसी वक़्त पूरब से लेकर पश्चिम तक संस्कृत (हिंदी की मातृभाषा) का बोलबाला था. हिंदी सिनेमा हो या हिंदी साहित्य विश्व में हिंदी की पहचान भारत से ही है, किन्तु अपने ही देश में केवल अपने राज्य या प्रचलित बोली को बोलने व अलग दर्जा दिलाने की जिद्द और होड़ के कारण यह हिंदी भाषा अपने संघर्ष के लिए जूझ रही है. यह केवल हिंदी भाषा बोलने वालो के लिए नहीं अपितु हर भाषा को बोलने वालो के मन में अपनत्व का भाव जगाती है. यह भी गंभीर प्रश्न है कि क्यों नहीं इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा अभी तक किसी सरकार द्वारा दिलवाया गया. या क्यों नहीं एक जनअभियान हिंदी के समर्थन में इस देश में हुआ? जवाब शायद आप ऊपर पढ़ चुके है, बस विचार करना बाकि है.

अंत में राष्ट्रभाषा व् राजभाषा की इस लड़ाई में केवल इतना विचार करे क्या हमारी पहचान हिन्दुस्तानी होकर हिंदी से नहीं है? अगर नहीं भी तो क्या हिंदुस्तान या भारत के लिए हम एक भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिलवा सकते? निसंदेह भारत की पहचान विविधताओं के समावेश की भूमि के रूप में है जैसे कई नदियाँ आकर सागर में मिलती है, उसी प्रकार कई भाषाओँ के बावजूद हिंदी एक सागर है जो इस देश की पहचान है और विवधता तो हमारी रगों में है और विवधता की पहचान हमारे अनेक राज्यों में अनेक भाषाओ को बोलने पर प्रदर्शित है ही. किन्तु क्या हमारे माता-पिता या दादा-दादी के द्वारा बोली जाने वाली भाषा के प्रति हमारी बेरुखी हमारे लिए शर्म की बात नहीं?

“ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार रटते रटते हमारे बच्चे अब एक भाषा के हो गए.
प्रेमचंद, दिनकर, निराला, मैथली को पढने वालो के शब्द जाने कहा खो गए..”

साभार: अधिवक्ता राजवर्धन गावडे

भाषा को समर्पित यह लेख आपको कैसा लगा हमें कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएं.

3 thoughts on “राष्ट्रभाषा और राजभाषा की लड़ाई में कहीं राष्ट्र का वर्चस्व तो दांव पर नहीं लग रहा!

  • August 10, 2018 at 8:10 pm
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    “ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार रटते रटते हमारे बच्चे अब एक भाषा के हो गए.
    प्रेमचंद, दिनकर, निराला, मैथली को पढने वालो के शब्द जाने कहा खो गए..”
    बिल्कुल सही लिखा है ,हिंदी हमारी ताकत है जिसके बल पर हमारे पहले की पिढ़ी ने इन्ही कवियोँ की कविताए पढ़कर हम भारतीयों को दुनिया भर में इतने बड़े बड़े स्थानों पर पहुँचाया ।
    लेखक को अभिनंदन और स्वागत कि आपने इस विषय पर चिंतन किया और उसे साफ शब्दो में प्रस्तुत किया।

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