पुत्रदा एकादशी का महत्व और व्रत विधि | Putrada Ekadashi Vrat Katha Puja Vidhi Mahtva in Hindi

पुत्रदा एकादशी का महत्व, कहानी, व्रत विधि, फल और उपवास की जानकारी | Putrada Ekadashi Ki Kahani, Importance, Vrat Vidhi, Fal and Mantra in Hindi

हिन्दू धर्म में अनेक प्रचलित कथाओं के अनुसार त्यौहार मनाएं जाते है. भारत में तीज, वृत और एकादशी का अधिक महत्व हैं. हिन्दू वर्ष में चौबीस एकादशियाँ होतीं हैं, परन्तु जब मलमास और अधिक मास आता है तब इनकी संख्या बढकर 26 हो जाती हैं. वर्ष की दो एकादशियों को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है. पौष और श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशियों को पुत्रदा एकादशी कहते हैं. अंग्रेजी केलेंडर के अनुसार पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी दिसम्बर या जनवरी के महीने में आती है जबकि श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी जुलाई या अगस्त के महीने में आती है. पौष माह की पुत्रदा एकादशी उत्तर भारतीय प्रदेशों में ज्यादा महत्वपूर्ण है जबकि श्रावण माह की पुत्रदा एकादशी दूसरे प्रदेशों में ज्यादा महत्वपूर्ण है. वर्ष 2018 में श्रावण माह की पुत्रदा एकादशी 21 अगस्त मंगलवार के दिन हैं.

पुत्रदा एकादशी की कहानी और महत्त्व(Putrada Ekadashi Ki Kahani and Importance)

द्वापर युग के आरम्भ में महिष्मति नगरी के राजा महीजित थे. राजा महीजित का कोई पुत्र नहीं था. जिसके कारण वे चिंतित रहते थे. उनका कहना था जिसकी संतान नहीं होती हैं उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही दुःख का कारण होती है. संतान प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परन्तु राजा को पुत्र प्राप्ति नहीं हुई. राजा की समस्या को हल करने के लिए उनके मंत्री वन में गए. जहां उन्हें सनातन धर्म के गूढ़ तत्वों को जानने वाले, समस्त शास्त्रों के ज्ञाता महात्मा लोमश मुनि मिले. लोमश मुनि उनकी समस्याओं को पहले ही जान चुके थे. उन्होंने राजा के मंत्रियों से कहा नि:संदेह मैं आप लोगों का हित करूँगा. मेरा जन्म केवल दूसरों के उपकार के लिए हुआ है, इसमें संदेह मत करो.

सभी मंत्री ने सबसे पहले ऋषि लोमश को प्रणाम किया. अपने राजा की समस्या को ऋषि लोमश के सामने रखा. जिसे सुनकर ऋषि लोमश ने राजा के पूर्व जन्म की कहानी बताई. मुनि लोमश ने कहा की राजा पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य था. निर्धन होने के कारण उसने बहुत से बुरे कर्म किये. एक बार राजा दो दिन से भूखे थे और अगले दिन ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को प्यास लगने पर एक जलाशय पर जल पीने गए. उसी जगह पर एक प्यासी गौ जल पी रही थी. राजा ने उस प्यासी गाय को जल पीते हुए हटा दिया और स्वयं जल पीने लगा, इसीलिए राजा को यह संतानहिन होने का दु:ख सहना पड़ रहा है. भूखे रहने की वजह से उन्हें राजा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. यह कथा सुनकर राजा के मंत्रीयों ने कहा, हे ऋषि वर हमें कुछ ऐसा उपाय बताए कि राजा की समस्या का हल हो जाएँ.

मुनि लोमश ने कहा की श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी को जिसे पुत्रदा एकादशी भी कहते हैं, तुम सब लोग व्रत करो और रात्रि को जागरण करो तो इससे राजा का यह पूर्व जन्म का पाप अवश्य नष्ट हो जाएगा, साथ ही राजा को पुत्र की अवश्य प्राप्ति होगी. राजा के मंत्रियों ने नगर में लौटकर राजा को पूरी बात बताई. जब श्रावण शुक्ल एकादशी आई तो ऋषि की आज्ञानुसार सबने पुत्रदा एकादशी का व्रत और जागरण किया. इसके बाद द्वादशी के दिन व्रत के फल स्वरुप रानी ने गर्भ धारण किया और उन्हें एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई.

व्रत विधि (Putrada Ekadashi Vrat Vidhi)

  • पुराणों के अनुसार दशमी तिथि को शाम में सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए और रात्रि में भगवान का ध्यान करते हुए सोना चाहिए.
  • एकादशी का व्रत रखने वाले को अपने मन को शांत एवं स्थिर रखना चाहिए. किसी भी प्रकार की द्वेष भावना या क्रोध मन में न लायें. परनिंदा से बचें.
  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करना चाहिए तथा स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान् विष्णु की प्रतिमा के सामने घी का दीप प्रज्वलित करना चाहिए.
  • भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी, ऋतु फल एवं तिल का प्रयोग करें.
  • व्रत के दिन अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए, शाम में पूजा के बाद चाहें तो फल ग्रहण कर सकते है.
  • यदि आप किसी कारण व्रत नहीं रखते हैं तो भी एकादशी के दिन चावल का प्रयोग भोजन में नहीं करना चाहिए.
  • एकादशी के दिन रात्रि जागरण का बड़ा महत्व है इसलिए रात में जागकर भगवान का भजन कीर्तन करें.
  • एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है.
  • अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को ब्राह्मण भोजन करवाने के बाद स्वयं भोजन करें.

फल (Putrada Ekadashi Ke Fal)

जिन दंपतियों को संतान की प्राप्ति नहीं होती हैं. उन्हें संतान प्राप्ति के लिए यह व्रत अवश्य करना चाहिए. श्रावण पुत्रदा एकादशी का श्रवण एवं पठन करने से मनुष्य के समस्त पापों का नाश होता है, वंश में वृद्धि होती है.

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Ujjawal Dagdhi

Ujjawal Dagdhi

उज्जवल दग्दी दिल से देशी वेबसाइट के मुख्य लेखकों में से एक हैं. इन्हें धार्मिक, इतिहास और सेहत से जुडी बातें लिखने का शौक हैं.

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